जानिए Bimari kyon hoti hai in hindi




बीमारी क्यो होती हैं? (Bimari kyo hoti hain / ham bimar kyon padte hain) स्वास्थ्य क्या है? विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के अनुसार स्वास्थ्य सिर्फ बीमारी की कमी नहीं है, वो है शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य।


चलिए देखते है, bimari kya hoti hai.

WHO, (World Health Organization) के दिए हुए आकडो के नुसार लगभग 70% बीमारियो को दवाई इलाज की जरुरत नही होती है। वो घरेलु उपाय पे ठीक हो सकते है। 25% बीमारी को साधारण उपाय या साधारण जाँच की जरुरत रहती है। केवल 5% मरीजों परिष्कृत जाँच और उपाय की जरुरत होती है।


उपरी प्रतिशत मे 70% वाले समूह को दवाई इलाज की जरुरत नही होती है, इस समूह में लगभग 40% बीमारी, मानसिक तनाव का शरीर पर हुआ प्रभाव होता है; जिसको हम मनोदैहिक (Psychosomatic) कहते है, बाकी बची 30% बीमारी विषाणु द्वारा (viruses) होती है। विषाणु द्वारा होने वाली बीमारिया प्रतिरक्षा प्रणाली के बल पर अपने आप ठीक हो जाती है उनको एंटीबायोटिक्स की जरूरत नहीं है।


'सयकोसोमॅटिक' बीमारी का मतलब क्या? ये नाहीं बीमारी का कोई नाटक होता है या कुछ नहीं होते हुए भी, होता हैं ऐसे भी नहीं बोल सकते है। सही मे इन लोगो मे ये बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। उनको शारीरिक तनाव रहता है। उसको PNI Axis (Psycho Neuro Immune Axis) के नाम से जाना जाता है। और उसका प्रभाव बीमारी पे होता हैं। यानि मन और बुद्धि को प्रभावित करने वाली समस्याएं तंत्रिका तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करती हैं। यह शरीर को अतिरिक्त एन्झाइम्स और हार्मोन बनाने का कारण बनता है। ये एन्झाइम्स और हार्मोन्स का प्रभाव त्वचा, श्वसन प्रणाली और पाचन तंत्र पर विभिन्न त्वचा विकार, अस्थमा, सर्दी, सूखी खांसी, लगातार एसिड भाटा, दस्त, सिरदर्द और शरीर ऐसे लक्षण दिखाई देते है।


जब शारीरिक दर्द इतना असहनीय होता है, जाँच करने पे सब कुछ सामान्य हो जाता है। मानसिक तनाव का ये शारीरिक प्रभाव होता हैं। इसीलिए इन मरीजों से प्यार से बातचीत करने की जरुरत होती ही। क्योंकि यह बीमारी उनके मन और बुद्धि पर पड़ता है। ऐसे समय में, रोगी की मनोदशा, रोगी की दिनचर्या, उसके शरीर पर ऋतुओं के परिवर्तन और उसके आहार में परिवर्तन को समझना महत्वपूर्ण है।


30% बीमारियां वायरस के कारण होती हैं, इसमें भी सयकोसोमॅटिक बीमारी रहने वाले मरीजों की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती है। उनके शरीर तुरंत वायरस का शिकार हो जाते हैं. सामान्य तौर पर, वायरल संक्रमण अंतर्निहित प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा ठीक किया जाता है। उनको (Antibiotics) की जरुरत नही होती है। बल्की यहाँ पे थोड़े से धैर्य की जरुरत होती हैं। हमारा शरीर खुद की सुरक्षा के लिए बहुत सावधान होता है. हमारी पहली रक्षा सफेद रक्त कोशिकाओं की मदद से बीमारी से लड़ती है. एक बार जब वायरस शरीर में प्रवेश करता है, तो सफेद कोशिकाओं को एंडोक्राइन ग्रंथियों का उत्पादन करने में कुछ समय लगता है जो उन्हें पहचान और विरोध कर सकते हैं (तीन -चार दिन).


एंटीबायोटिक्स का वायरस पर असर नहीं होता है। यदि वो कारण की अनुपस्थिति में दिया जाता है, तो इसका शरीर की कोशिकाओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। मतलब 70% बीमारीओं में एंटीबायोटिक्स की जरुरत ही नहीं होती है।


लगभग ३०% बिमारियो को इलाज की जरुरत होती है, उसमे से २५% मरीजोंको साधारण इलाज से राहत मिल सकती है। ३% मरीजोंको एंटीबायोटिक्स और साधारण इलाज, बाकी २% मरीजोंको एंटीबायोटिक्स एंड स्पेशलिस्ट डॉक्टर के जाँच की अवशकता होती है।


इसमे हमे कोनसे समूह की बीमारी हुई है, उसके लिए इलाज करवाए या न करवाए , अगर इलाज नही करवाते हे तो कोई हानि तो नहीं होगी ना, ये सब कैसे पहचाने?


इस के लिए हमें अपने स्वयं के शरीर के साथ संवाद करने की आवश्यकता है। ऐसा संवाद करने के लिए कोई डॉक्टर, या महंगी मशीनरी द्वारा जाँच करवाने की जरुरत नहीं है। इसके लिए थोड़ा आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। आज के तारिक मे मिलो दूर किसीको संवाद करना मुमकिन है, लेकिन खुदसे संवाद करना महाकठिन हो चूका है लेकिन हर व्यक्तिने खुद के शरीर के लिए थोडासा समय निकाल के संवाद करना जरुरी है।


हर छोटीसी छोटी चीज के लिए डॉक्टर के पास जाने के आलावा हम खुद उस चीज के लिए क्या कर सखते हे ये देखना आना चाहिए। हमे Bimari kyo hoti he, ham bimar kyon padte hain इसके लिए हमारे दिनकार्य, या व्यवहार में बदलाव करके, घरेलु उपाय के आधार पर शरीर को व्यवस्थित रखने के लिए सरल तकनीकों के बारे में पता होना चाहिए। हमारी बीमारी अनुपचारित समूह में आती है और यदि आप खुद को परिष्कृत स्वास्थ्य जांच के चक्र में पाते हैं तो उसमे से बाहर निकलना महामुश्क़िल हो जाता है। ऐसे समय मे पैसा, समय और मानसिक कष्ट के अलावा, हानिकारक दवाओं से भी गुजरना पड सकता है।

7 views0 comments